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"इतिहास में दर्ज वो प्रेम जो मरकर भी अमर हो गया। राजस्थान की सबसे भावनात्मक सच्ची प्रेम कहानी पढ़ें (भाग 2)
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राजा सूरजमल और रानी चांदकंवर — रेत की रियासत का अधूरा चाँद (भाग 2)
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| सूरजमल |
युद्ध की संध्या
कन्हेरगढ़ की हवाओं में अब बारूद की गंध थी। सूरजमल ने किले के बुर्ज पर खड़े होकर आसमान की ओर देखा — सूरज ढल रहा था, और उसके साथ ही एक युग का अंत नज़दीक आ रहा था।
चांदकंवर अब महल में थीं, पर वे अब रानी नहीं, बल्कि एक योद्धा की आत्मा थीं। उन्होंने अपने केश बाँध लिए, गले में सोने की माला उतार दी, और तलवार उठाई। उनकी आँखों में आँसू नहीं थे — बस वह दृढ़ निश्चय था, जो किसी रानी के मर्यादा से परे जाकर एक स्त्री के धर्म को परिभाषित करता है।
रात के अंधकार में सैनिकों ने कसम खाई कि वे अंतिम सांस तक कन्हेरगढ़ की धरती नहीं छोड़ेंगे। दूर मांडवगढ़ की सेना बढ़ रही थी — रथों की गर्जना, मशालों की रोशनी और धूल का बवंडर।
रानी चांदकंवर ने राजा से कहा — “अगर मैं कल न रहूँ, तो मुझे किसी मंदिर की मूर्ति न बनवाना, बस मेरी राख इस रेत में बिखेर देना। यही मेरी मातृभूमि है।” सूरजमल ने कुछ नहीं कहा, बस अपनी तलवार उनके पैरों के आगे झुका दी। वह मौन ही उस समय का सबसे सच्चा संवाद था।
विश्वासघात का तीर
सूरजमल को अंदेशा था कि भीतर से कोई न कोई धोखा करेगा। दरबार में कुछ लोग ऐसे थे जो युद्ध से नहीं, सत्ता से प्रेम करते थे। उन्हीं में एक नाम था — सेनापति देवसिंह, जो गुप्त रूप से मांडवगढ़ से मिला हुआ था।
देवसिंह ने रात के अंधेरे में शत्रु को किले के पिछले दरवाज़े का नक्शा भेज दिया। वह जानता था, सूरजमल को हरा पाना कठिन है, पर अगर भीतर से किला गिर जाए, तो जीत निश्चित है।
सुबह की पहली किरण से पहले ही मांडवगढ़ की सेना ने हमला किया। पीछे के द्वार से कुछ सैनिक अंदर घुस आए। कन्हेरगढ़ के सैनिकों ने मोर्चा संभाल लिया, लेकिन भारी नुकसान हुआ। रानी चांदकंवर ने घायल सैनिकों को स्वयं पानी पिलाया।
सूरजमल को जब पता चला कि धोखा हुआ है, उन्होंने देवसिंह को बुलाया। देवसिंह काँपते हुए बोला — “राजन, मैंने मांडवगढ़ को रास्ता दिखाया, पर यह सोचकर कि वे केवल वार्ता करेंगे।” सूरजमल ने तलवार नहीं चलाई — उन्होंने बस कहा, “तू आज जीवित रहेगा ताकि तेरे अपराध का बोझ तुझे तिल-तिल जलाए।”
इतना कहकर उन्होंने अपनी सेना को आदेश दिया — “अब कोई पीछे नहीं हटेगा, आज यह रेत हमारे रक्त से पवित्र होगी।”
युद्ध की ज्वाला
युद्ध आरम्भ हुआ। रेत की धूल और तलवारों की चमक आपस में घुल गई। आकाश लाल हो गया — जैसे सूरज खुद खून से नहा गया हो।
सूरजमल ने अपने हाथ में स्वर्णमयी तलवार थामी और अपने घोड़े शौर्य पर सवार हुए। उन्होंने दुश्मन के मध्य पहुँचकर ऐसा युद्ध किया कि स्वयं मांडवगढ़ के सैनिक भयभीत हो उठे। तलवार की हर चोट उनके प्रेम की गवाही थी।
रानी चांदकंवर भी पीछे नहीं रहीं। उन्होंने महल की स्त्रियों के साथ मिलकर घायल सैनिकों की देखभाल की, फिर जब चारों ओर युद्ध का कोलाहल फैला, तो वे स्वयं तलवार लेकर आगे बढ़ीं।
कहा जाता है, उस दिन रेगिस्तान में एक स्त्री का स्वर गूंजा — “जो धरती माँ की गोद में जन्मा है, वह आज उसकी रक्षा में मिट जाएगा।” और उसके बाद तलवारों की टकराहट में जैसे आकाश भी झुक गया।
परंतु धीरे-धीरे युद्ध का पलड़ा मांडवगढ़ की ओर झुकने लगा। कन्हेरगढ़ की सेना थक चुकी थी, पानी की कमी थी, और देवसिंह का विश्वासघात उनके गढ़ को कमजोर कर चुका था। सूरजमल को तीर लगा — कंधे के पास गहरा घाव। उन्होंने फिर भी कहा, “जब तक मेरी साँस है, यह ध्वज नहीं झुकेगा।”
रानी का त्याग
सूरजमल घायल अवस्था में महल लौटे। रानी ने उनकी पट्टी बाँधी। उन्होंने कहा — “राजन, आप विश्राम करें।” सूरजमल ने मुस्कुराते हुए कहा — “राजाओं को विश्राम नहीं, बलिदान शोभा देता है।”
रानी ने जब देखा कि सेना टूट रही है, तो उन्होंने सभी रानियों और महल की स्त्रियों को एकत्र किया। उन्होंने कहा — “आज जौहर की तैयारी करो। अगर कन्हेरगढ़ गिर गया, तो हमारी अस्मिता नहीं।”
महल में अग्निकुंड सजाए गए। स्त्रियों ने अपने गहने उतार दिए, माथे पर सिंदूर का तिलक लगाया, और प्रार्थना की — “हे देव, अग्नि के माध्यम से हमारी आत्माएँ मुक्त हों।”
रानी चांदकंवर ने सूरजमल से अंतिम बार कहा — “राजन, अगर अग्नि में उतरने से पहले मैं आपकी आँखों में देख लूँ, तो मेरा जीवन सफल है।” सूरजमल ने कहा — “तुम मेरी रानी नहीं, मेरी आत्मा हो। तुम अमर रहोगी।”
इसके बाद रानी अग्निकुंड में प्रविष्ट हुईं। उनके चेहरे पर कोई भय नहीं था, केवल शांति थी। महल में गूँज उठा — “जय माँ कन्हेरगढ़ी!” और फिर सब कुछ आग की लपटों में विलीन हो गया।
सूरजमल उस दृश्य को देखकर निढाल हो गए। उन्होंने तलवार आकाश की ओर उठाई और कहा — “प्रेम का अंत नहीं, यह आरंभ है। अब मेरा अस्त्र उस ईश्वर के लिए चलेगा जिसने मुझे प्रेम का वरदान दिया।”
राजा सूरजमल का घाव
अगले दिन सूरजमल अंतिम युद्ध में उतरे। उन्होंने अकेले ही दुश्मन की पंक्ति भेद दी। उनके घोड़े के खुर रेत पर रक्त की लकीरें छोड़ते गए। एक तीर उनके हृदय में आ लगा, पर उन्होंने झंडा नहीं गिरने दिया।
उनके अंतिम शब्द थे — “चांदकंवर, तुम्हारे बिना यह रियासत केवल मिट्टी है। अब मैं इस मिट्टी का हिस्सा बनकर तुम्हारे पास आ रहा हूँ।”
सूरजमल भूमि पर गिर पड़े। रेगिस्तान की हवा थम गई। सैनिक रोने लगे। कहते हैं, उसी रात कन्हेरगढ़ का आसमान लाल हो गया था — जैसे सूर्य और चाँद दोनों ने अपनी आत्माएँ एक साथ अर्पित कर दी हों।
युद्ध के बाद मांडवगढ़ की सेना ने किला जीत लिया, लेकिन किसी ने भी उस किले में रहना स्वीकार नहीं किया। क्योंकि हर रात वहाँ से रानी चांदकंवर की वीणा की आवाज़ सुनाई देती थी — एक अधूरी रागिनी, जो प्रेम और पीड़ा दोनों का प्रतीक थी।
रेगिस्तान की निस्तब्धता
सालों बाद, जब अंग्रेज़ी शासन आया, तब भी कन्हेरगढ़ का किला वीरान ही रहा। कहते हैं, हर पूर्णिमा की रात वहाँ एक छाया दिखती है — रानी चांदकंवर की, जो किले की दीवारों पर दीपक रखती है, जैसे अब भी अपने राजा की प्रतीक्षा कर रही हो।
स्थानीय लोग आज भी उस जगह को “रेत की रानी” कहते हैं। और वहाँ की रेत में अगर कोई आँसू गिरे, तो वह जल्दी सूखता नहीं। मानो धरती खुद भी उस प्रेम के आँसुओं को सहेज कर रखती हो।
भाग 3 की झलक
अगले भाग में — प्रेम का अमर रूप, रानी चांदकंवर की आत्मा का पुनर्जन्म, और इतिहास के अंतिम पृष्ठ पर दर्ज एक अमर वचन: “प्रेम मरता नहीं, बस रूप बदल लेता है।”




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