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राजा सूरजमल और रानी चांदकंवर की सच्ची प्रेम कहानी | राजस्थान की अमर प्रेमगाथा ❤️ (भाग 1)

राजा सूरजमल और रानी चांदकंवर — रेत की रियासत का अधूरा चाँद  (भाग 1)


राजा सूरजमल




(राजस्थान की धरती पर जन्मी एक अमर प्रेमगाथा, जो युद्ध, त्याग और आँसुओं में डूबी हुई है)

 


रियासत का परिचय

राजस्थान की रेत पर फैली अनगिनत हवेलियों और किलों के बीच, कन्हेरगढ़ नाम की एक रियासत थी। यह रियासत जोधपुर और बीकानेर की सीमाओं के बीच बसी थी — जहाँ सूरज की तपिश और लोगों का दिल, दोनों बराबर जलते थे। उस दौर में जब मुगल सल्तनत का प्रभाव कमज़ोर हो रहा था, छोटी-छोटी रियासतें अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थीं।

कन्हेरगढ़ अपने सौंदर्य और अनुशासन के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ के लोग साधारण पर मेहनती थे, और उनकी निष्ठा अपने राजा पर अटूट थी। किले की ऊँचाई से चारों ओर फैले रेतीले मैदान ऐसे लगते जैसे स्वर्ण की चादर बिछी हो।

यहीं के राजा थे सूरजमल सिंह राठौड़ — जिनकी आँखों में धूप की चमक थी और दिल में अपने राज्य की इज़्ज़त की लौ जलती थी। और इन्हीं की नियति में बसी थी एक ऐसी प्रेमकथा जो इतिहास के किसी ग्रंथ में नहीं, बल्कि लोगों की आँखों में आज भी आँसू बनकर तैरती है।


राजा सूरजमल — मरुभूमि का सूर्य

सूरजमल बचपन से ही पराक्रमी और तेजस्वी थे। तलवार की धार और न्याय की भाषा दोनों पर समान अधिकार रखते थे। उनके पिता राजा प्रतापसिंह एक सख्त लेकिन न्यायप्रिय शासक थे, जिन्होंने बेटे को सिखाया था — "राजा वही जो अपने आँसुओं को भी तलवार बना सके।"

कन्हेरगढ़ की सीमा पर मांडवगढ़ नामक एक और रियासत थी, जिसके साथ वर्षों पुराना जल विवाद चलता आया था। सूरजमल जब जवान हुए, उन्होंने तय किया कि दुश्मनी के बजाय संवाद से समाधान लाया जाए। यही नीति उनकी पहचान बनी।

राज्य की जनता उन्हें “मरुभूमि का सूर्य” कहती थी — क्योंकि वे दिनभर जनता के बीच रहते, खेतों में जाते, सैनिकों से बात करते, और रात्रि में दरबार के बजाय आकाश के नीचे बैठकर निर्णय लिया करते थे। उनका हृदय बड़ा था, पर किस्मत उससे भी बड़ी परीक्षा लेने वाली थी।

रानी चांदकंवर — चाँद की शीतलता

मांडवगढ़ की रानी चांदकंवर बचपन से ही विलक्षण बुद्धिमती और संगीत-प्रेमी थीं। उनकी आँखों में एक अजीब-सी करुणा थी — जैसे रेगिस्तान की रात में चाँदनी उतरती हो। वे नृत्य में निपुण थीं, पर उनका असली सौंदर्य उनके वचनों में था।



रानी चांदकंवर



कहा जाता है कि जब वे तेरह वर्ष की थीं, तब उन्होंने अपने पिता को युद्ध के मैदान से लौटते सैनिकों के जख्मों पर खुद मरहम लगाया था। तभी से लोग उन्हें "दयामयी चांदकंवर" कहने लगे।

कन्हेरगढ़ और मांडवगढ़ की सीमाओं पर जब दोनों राज्यों के बीच व्यापार के लिए सभा रखी गई, वहीं पहली बार सूरजमल और चांदकंवर की नज़रें मिलीं — और रेत की उस तपती दोपहर में मानो कोई फूल खिल उठा।

पहली मुलाकात — रेत में खिला फूल

सभा में जब सूरजमल ने अपनी बात रखी, चांदकंवर अपने पिता के साथ वहाँ मौजूद थीं। सूरजमल की वाणी में दृढ़ता थी, और नज़रों में विनम्रता। उनके शब्द केवल राजनीति नहीं, इंसानियत की बात करते थे। चांदकंवर ने पहली बार किसी राजा को इतना नम्र देखा।

सभा के बाद जब सब लोग विदा होने लगे, सूरजमल ने अनजाने में एक स्क्रॉल (पांडुलिपि) गिरा दी। चांदकंवर ने उसे उठाया — उसमें लिखा था, “शांति ही सबसे बड़ी विजय है।” उस वाक्य ने उसके मन पर गहरी छाप छोड़ी।

उस दिन के बाद दोनों के बीच राजनयिक पत्रों के माध्यम से संवाद शुरू हुआ। कभी बारिश के हाल पर, कभी युद्ध की नीति पर, और कभी बस इस पर कि रेत की खुशबू कितनी बदल गई है। धीरे-धीरे यह संवाद आत्मा की भाषा बन गया।

राज्य की दीवारों से परे उनका रिश्ता पनप रहा था। सूरजमल ने एक रात अपने विश्वस्त सेनापति से कहा — “यह प्रेम नहीं, यह कर्म है। वह मेरी नियति है, और शायद मैं उसकी परीक्षा।”

प्रेम की परख — रियासत से ऊपर रिश्ता

साल 1687 का वह समय था जब राजस्थान की रियासतों में सत्ता बदलने की हवाएँ चल रही थीं। छोटे राजा बड़े राज्यों के अधीनता स्वीकार रहे थे। ऐसे में सूरजमल और चांदकंवर का संबंध राजनीतिक दृष्टि से असंभव माना जाता था।

मांडवगढ़ के दरबार में यह बात पहुँची कि रानी चांदकंवर का मन कन्हेरगढ़ के राजा से जुड़ा है। उनके पिता, राजा रणजीतसिंह, इसे एक अपमान समझ बैठे। उन्होंने तुरंत आदेश दिया कि चांदकंवर की शादी अजमेर के ठाकुर जगदीशसिंह से तय की जाए — ताकि यह “भ्रम” हमेशा के लिए मिट जाए।

चांदकंवर ने जब यह सुना, तो उनके कदमों से ज़मीन खिसक गई। उन्होंने पहली बार अपने पिता के सामने कहा, “पिता, राज्य की मर्यादा से बड़ा यदि कुछ है, तो वह मनुष्य का सच्चा वचन।” लेकिन राजदरबार में एक पुत्री की आवाज़ सत्ता के शोर में दब गई।

उधर सूरजमल को जब यह खबर मिली, उन्होंने युद्ध नहीं, संवाद चुना। उन्होंने मांडवगढ़ जाने की ठानी — अकेले, बिना सेना के। रानी से नहीं, बल्कि उनके पिता से बात करने। लोग बोले, “राजन, यह आत्मघात है।” पर सूरजमल ने मुस्कुराते हुए कहा — “सत्य बोलने से बड़ा कोई शस्त्र नहीं।”

मांडवगढ़ पहुँचने पर उनका स्वागत तलवारों से हुआ, पर सूरजमल ने किसी का सामना नहीं किया। उन्होंने राजा रणजीतसिंह से केवल इतना कहा — “मैं आपकी बेटी नहीं, आपकी इज़्ज़त माँगने आया हूँ। उसे मेरे नाम से जोड़ लीजिए, आपका नाम अमर हो जाएगा।”

दरबार सन्नाटे में डूब गया। रणजीतसिंह ने कहा — “राजा सूरजमल, तुम्हारे शब्दों में जादू है, पर मेरा वचन पत्थर है।” और उसी दिन उन्होंने घोषणा कर दी कि चांदकंवर की शादी तय है।

रात को चांदकंवर ने अपने महल की छत से देखा — सूरजमल की मशाल दूर जाती हुई जल रही थी। वह रो पड़ीं। उन्होंने आसमान की ओर देखा — “हे ईश्वर, अगर प्रेम पाप है, तो मेरा जीवन ही उसकी सज़ा हो।”


बदलती हवाएँ — राजनीति, षड्यंत्र और शत्रुता

उस अस्वीकृति ने दोनों राज्यों के बीच संबंध तोड़ दिए। सूरजमल की वापसी के बाद मांडवगढ़ ने व्यापार पर रोक लगा दी। सीमाओं पर तनाव बढ़ने लगा। जो रिश्ता दो दिलों के बीच बना था, वह अब दो सेनाओं के बीच संघर्ष बन चुका था।




सूरजमल ने युद्ध से बचने की कोशिश की, पर उनकी अपनी परिषद ने दबाव बनाया — “राजन, अपमान का बदला लिए बिना रियासत की गरिमा नहीं बचती।” सूरजमल ने कहा — “अगर मैं प्रेम के लिए लड़ूँ तो योद्धा रहूँगा, पर अगर अभिमान के लिए लड़ूँ, तो केवल हत्यारा।”

इसी बीच, चांदकंवर ने मांडवगढ़ से भागने की ठानी। उसने अपनी दासी मुक्ता से कहा — “अगर भाग्य ने मुझे राजकुमारी बनाया है, तो उसे चुनौती देना भी मेरा धर्म है।”

रात के तीसरे पहर, घोड़े की टापें रेगिस्तान में गूँज उठीं। रेत के कण उड़ रहे थे, और चांदकंवर अपने भाग्य की डोर खींच रही थीं। सूरजमल को खबर मिली, वे सीमा की ओर दौड़े। जब दोनों की नज़रें मिलीं, तो एक पल के लिए सारा रेगिस्तान शांत हो गया।

लेकिन नियति शायद इतनी सरल नहीं थी। मांडवगढ़ के सैनिकों ने पीछा किया। सूरजमल ने अपने कुछ सैनिकों को रोकने का आदेश दिया, पर लड़ाई छिड़ गई। चांदकंवर ने कहा — “राजन, अब यह प्रेम नहीं, परिक्षा है।” सूरजमल बोले — “तो मैं तुम्हारे साथ अपनी अंतिम साँस तक रहूँगा।”

युद्ध का बिगुल बज चुका था। अगला भाग उसी युद्ध की कथा है — जहाँ प्रेम और रियासत दोनों एक साथ दाँव पर लगेंगे।

भाग 2 की झलक

अगले भाग में — युद्ध की पहली रात, सूरजमल का बलिदान, और चांदकंवर का निर्णय जो इतिहास की सबसे करुण कथा बनेगा।

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