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“राजा सूरजमल और रानी चांदकंवर – ❤ प्रेम जिसने मृत्यु को भी हरा दिया ” (भाग 3)
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राजा सूरजमल और रानी चांदकंवर — रेत की रियासत का अधूरा चाँद (भाग 3)
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| चांदवी |
(प्रेम का पुनर्जन्म, लोककथा की अमरता और आँसुओं से भरा अंत)
पुनर्जन्म की कथा
कहते हैं, जहाँ सच्चा प्रेम अपूर्ण रह जाता है, वहाँ आत्माएँ अधूरी नहीं रहतीं — वे फिर लौटती हैं। रानी चांदकंवर और राजा सूरजमल की आत्माएँ भी लौट आईं, पर इस बार उन्होंने कोई राजमहल नहीं चुना।
साल 1893 में, बीकानेर के पास एक छोटे से गाँव रतनसर में एक कन्या जन्मी — नाम रखा गया चांदवी। उसकी आँखों में बचपन से ही कुछ ऐसा था, जैसे वे सदियों से किसी का इंतज़ार कर रही हों।
उसी वर्ष, जोधपुर के एक किसान परिवार में एक बालक हुआ — नाम रखा गया सूरजदान। जब वह दस वर्ष का हुआ, तो हर रात उसे एक ही सपना आता — एक किला, जिसमें आग लगी है, और कोई स्त्री उसे पुकार रही है — “राजन!”
गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे, “इन दोनों के बीच कोई पुराना बंधन है।” पर कौन माने? किसी को पता नहीं था कि यह वही आत्माएँ हैं, जो सदियों पहले रेत में विलीन हुई थीं।
गाँव की दास्तान
चांदवी बड़ी हुई। उसकी चाल, उसका स्वभाव, सबमें एक राजसी आभा थी। वह अकसर रेगिस्तान की तरफ़ चली जाती और घंटों तक रेत में बैठी रहती — मानो किसी अदृश्य व्यक्ति से बातें कर रही हो।
एक दिन मेले में उसकी मुलाकात सूरजदान से हुई। जैसे ही दोनों आमने-सामने आए, हवा रुक गई, और रेगिस्तान की धूल में वही स्वर गूंजा — “प्रेम मरता नहीं…”। दोनों कुछ नहीं बोले, बस एक-दूसरे को देखते रहे। उनकी आँखों में वह पहचान थी, जो केवल आत्माएँ समझती हैं।
समय बीता, दोनों के परिवारों ने विवाह की बात उठाई। सब कुछ सामान्य था, पर जब विवाह की तिथि तय हुई — उसी दिन के पहले एक रात चांदवी ने सपना देखा। किला, आग, और वही आवाज़ — “कन्हेरगढ़ का ध्वज फिर लहराएगा।”
सुबह वह रेगिस्तान की ओर भागी। सूरजदान भी पीछे गया। दोनों उसी वीरान टीले तक पहुँचे, जहाँ अब केवल टूटी दीवारें और रेत थी। वहाँ एक शिलालेख पड़ा था — जिस पर लिखा था, “यहाँ रानी चांदकंवर ने अग्नि में प्रवेश किया था।”
सूरजदान ने वह शिलालेख पढ़ा और जैसे सब कुछ याद आ गया। उसने चांदवी का हाथ पकड़ा और बोला — “हम फिर मिल गए, मेरी रानी।” चांदवी की आँखों से आँसू बह निकले — “पर इस बार युद्ध कौन जीतेगा?”
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| सूरजदान |
कन्हेरगढ़ का राज़
उसी शाम रेत का तूफ़ान उठा। दोनों ने एक-दूसरे को कसकर थाम लिया। कहते हैं, तूफ़ान के थमने के बाद लोग जब वहाँ पहुँचे, तो केवल दो दीपक जलते मिले — एक टूटी दीवार के पास।
गाँव के बुज़ुर्गों ने कहा, “राजा सूरजमल और रानी चांदकंवर की आत्माएँ अब मुक्त हो गईं।” तभी किसी ने देखा — किले की दीवार पर हल्की सी रोशनी उभरी, जैसे चाँदकंवर की वीणा फिर से बज उठी हो।
उस दिन के बाद वह किला फिर कभी वीरान नहीं रहा। हर पूर्णिमा की रात, जब हवा चलती है, तो रेत के कणों में दो आकृतियाँ दिखती हैं — एक पुरुष और एक स्त्री, जो हाथ में हाथ डाले रेगिस्तान के पार जा रहे होते हैं।
रेत और आँसुओं का संगम
आज भी जो कोई रतनसर के पास उस टीले पर जाता है, वह कहता है — “यहाँ की रेत नमी लिए है।” शायद यह वही आँसू हैं जो सदियों पहले रानी ने इस भूमि को सौंपे थे।
स्थानीय लोग मानते हैं कि अगर कोई सच्चे दिल से वहाँ कोई मुराद माँगे, तो वह पूरी होती है — क्योंकि वहाँ प्रेम की आत्माएँ अब भी प्रहरी बनकर खड़ी हैं।
गाँव के बच्चे अब भी उस कहानी को “रेत का प्रेम” कहकर सुनते हैं। स्कूल के बाद जब वे उस टीले के पास खेलते हैं, तो उन्हें कभी-कभी किसी वीणा की धीमी धुन सुनाई देती है।
वह आवाज़ अब भी कहती है — “जहाँ प्रेम है, वहाँ मृत्यु नहीं।” और शायद यही इस कहानी का सबसे सच्चा संदेश है।
लोककथा बन चुका प्रेम
समय के साथ यह कथा पूरे राजस्थान में फैल गई। लोकगीतों में “चांदकंवर” का नाम लिया जाता है — “रेत में सोया सूरजमल, चाँदनी ढूँढे उसे हर रात।”
कई इतिहासकारों ने खोज की — उन्हें कन्हेरगढ़ के पास कुछ शिलालेख मिले जिनमें “सूरजमलदेव” और “चांदकंवरि” का उल्लेख था। यानि यह कथा केवल लोककथा नहीं, बल्कि किसी सच्ची रियासत की धुंधली स्मृति है।
और अब भी जब सूरज ढलता है, रेत सुनहरी हो जाती है — लोग कहते हैं, “देखो, सूरजमल अपनी रानी से मिलने जा रहा है।”
अंतिम स्मरण
राजस्थान की धरती ने हमेशा प्रेम और बलिदान की कहानियाँ जन्म दी हैं। पर राजा सूरजमल और रानी चांदकंवर की कथा कुछ अलग है — क्योंकि यह केवल इतिहास नहीं, भावना की वह ज्वाला है जो आज भी बुझी नहीं।
रेत की यह रियासत आज भी याद दिलाती है कि प्रेम समय से परे है — न उसे युद्ध हरा सका, न मृत्यु रोक सकी।
और जब भी कोई जोड़ा उस किले के खंडहरों में हाथ पकड़कर चलता है, तो हवा में वह स्वर गूँजता है —
“प्रेम मरता नहीं, बस रूप बदल लेता है…”
By - Ram AI Craft
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