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भाग 2 — युद्ध और वियोग ( रानी देवयानी और रणवीर पठान )
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भाग 2 — युद्ध और वियोग
6. रेत का तूफ़ान और युद्ध की आहट
नागौर और मरवार के बीच सीमाओं को लेकर फिर से तनाव बढ़ गया। दोनों दरबारों में राजनीति के बादल गहराने लगे। जो प्रेम दो आत्माओं को जोड़ चुका था, वही अब दो रियासतों के बीच विभाजन का कारण बन रहा था। मरवार के नवाब ने घोषणा की — “हम नागौर पर चढ़ाई करेंगे, ताकि हमारी प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रहे।”
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| नागौर की धरती |
रणवीर को सेनापति बनाकर भेजने का आदेश हुआ। रणवीर के लिए यह सबसे कठिन क्षण था। एक ओर उसका कर्तव्य था, दूसरी ओर उसका प्रेम। उसने नवाब से कहा, “मैं अपनी रियासत की रक्षा करूँगा,
लेकिन नागौर की धरती पर खून नहीं बहाऊँगा।” नवाब ने व्यंग्य से कहा, “फिर तलवार रख दो और प्रेम का हार पहन लो, रणवीर!” रणवीर ने उत्तर नहीं दिया। उसने सिर्फ़ आसमान की ओर देखा — जहाँ चाँद उदास था।
7. रानी देवयानी का सपना
उधर नागौर में रानी देवयानी हर रात छत पर जाकर रेत को देखती। हवा में जैसे रणवीर की खुशबू थी। उसने मंदिर में जाकर प्रण लिया — “यदि युद्ध हुआ, तो मैं रणवीर की जान नहीं जाने दूँगी, चाहे अपनी देनी पड़े।”
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| देवयानी |
उस रात उसने सपना देखा — रणवीर घायल पड़ा है, उसके सीने में तलवार धँसी है, और चारों ओर आग की लपटें हैं। देवयानी चीखते हुए जागी, और उसके आँसू तकिए को भिगो गए। उसने जाना, नियति अब उसे आज़माने वाली है।
⚔️ 8. युद्ध का आरंभ
भोर के समय जब सूरज रेत से झाँका, तो दोनों रियासतों की सेनाएँ आमने-सामने थीं। रणवीर ने अपनी सेना को पीछे खड़ा किया और कहा, “हम सिर्फ़ रक्षा करेंगे, आक्रमण नहीं।”
नागौर के राजा पृथ्वीपाल सिंह स्वयं युद्धभूमि में उतरे। देवयानी महल की ऊँचाई से यह सब देख रही थी — उसकी साँसें रुक-रुककर चल रही थीं। युद्ध के पहले ही प्रहार में नागौर की ओर से कई सैनिक गिरे। रणवीर तलवार थामे खड़ा था, लेकिन उसने किसी पर वार नहीं किया।
तभी मरवार के सैनिकों ने आगे बढ़ते हुए नागौर की सीमा तोड़ दी। देवयानी ने देखा, उसके पिता की सेना पीछे हट रही है। उसने रथ मँगवाया और खुद रणभूमि की ओर चल दी। सभी दासियाँ चिल्लाईं — “महारानी! यह मृत्यु का मैदान है!” पर वह बोली — “प्रेम के बिना जीवन मृत्यु से भी कठिन होता है।”
9. रणवीर और देवयानी आमने-सामने
जब देवयानी रणभूमि पर पहुँची, रेत की आँधी चल रही थी — सूर्य लहू में रंगा हुआ था। रणवीर अपने घोड़े से उतरा और सामने देखा — देवयानी उसके सामने खड़ी थी, रथ से उतरकर। उसकी आँखों में आँसू थे, मगर चेहरा तेजस्वी था। उसने कहा — “तुम्हारा वचन कहाँ है, रणवीर? तुमने कहा था युद्ध नहीं करोगे!”
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| देवयानी , रणवीर |
रणवीर ने तलवार ज़मीन में गाड़ दी — “मैंने किसी पर वार नहीं किया, देवयानी। पर यदि मैं पीछे हट गया, तो मेरे अपने लोग मुझे गद्दार कहेंगे।” देवयानी ने उसकी तलवार उठाई और कहा — “तो आज यह तलवार मेरी होगी। आज नागौर की रक्षा मैं करूँगी।”
रणवीर ने धीरे से कहा, “प्रेम और कर्तव्य की जंग में कोई नहीं जीतता, बस इतिहास रोता है।” दोनों की आँखें नम थीं। वह क्षण ऐसा था जब समय रुक गया, हवा थम गई, और रेत की हर कण ने प्रार्थना की।
10. धोखे की रात
जब सूर्य डूबा, तो रणभूमि में अस्थायी युद्धविराम की घोषणा हुई। दोनों सेनाएँ अपने शिविरों में लौटीं। रणवीर अकेला नदी के किनारे गया। उसने तलवार धोई और आसमान की ओर देखा — “हे खुदा, मैंने पाप नहीं किया। मैंने बस प्रेम किया।” लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था।
रात के तीसरे पहर मरवार के कुछ विश्वासघाती सैनिकों ने नागौर के शिविर पर गुप्त हमला कर दिया। उन्हें लगा कि रणवीर ने जानबूझकर युद्ध रोका है। उन्होंने उसी की तलवार उठाई और नागौर के सैनिकों पर वार कर दिए। अफरातफरी मच गई। देवयानी महल से बाहर दौड़ी, रणभूमि में आग लगी थी, और चारों ओर चीखें थीं। उसने एक घायल सैनिक से पूछा — “कौन-सा योद्धा यह कर रहा है?”
सैनिक ने काँपते हुए कहा — “रणवीर पठान... उसकी तलवार की पहचान है।” देवयानी का दिल टूट गया। “नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता।” वह अंधेरे में दौड़ी — रणवीर तक पहुँची, जो खुद घायल पड़ा था। उसने कहा, “देवयानी... मुझ पर भरोसा रखो... यह धोखा है...” लेकिन उसके शब्द अधूरे रह गए — देवयानी ने देखा, उसकी छाती से खून बह रहा था। उसने सिर अपनी गोद में रखा और चिल्लाई — “हे भगवान! प्रेम का यह अंत क्यों?”
11. वियोग का सवेरा
सूरज उगा, मगर उसके साथ नागौर की रेत लाल थी। रणवीर की देह अब भी देवयानी की गोद में थी। नागौर के सैनिकों ने उसे देखा तो भ्रम फैल गया — सबको लगा रानी ने शत्रु को बचाया। राजा पृथ्वीपाल पहुँचे। उन्होंने देखा — बेटी के आँचल में शत्रु पड़ा है।
उनका क्रोध और दुःख दोनों चरम पर थे। उन्होंने कहा — “तुमने अपने पिता का सिर झुका दिया, देवयानी!” देवयानी ने आँसू पोंछे और उत्तर दिया — “नहीं पिता, मैंने बस इंसानियत को मरने नहीं दिया।” पिता कुछ नहीं बोले। रणवीर की देह उसी दिन नागौर की सीमा पर अग्नि को समर्पित की गई।
देवयानी वहाँ खड़ी रही, आँखें सूख गईं। राख उड़ती रही, और हवा में उसका नाम गूँजता रहा — “रणवीर... रणवीर...” उस दिन नागौर की धरती ने आँसू बहाए। और रानी देवयानी मौन हो गई — जैसे उसकी आत्मा उसी चिता में जल गई हो।
— भाग 2 समाप्त —
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