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भाग 3 — अंत और अमरता ( रानी देवयानी और रणवीर पठान )
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भाग 3 — अंत और अमरता
12. शोक की चुप्पी
रणवीर की चिता की राख ठंडी हो चुकी थी, पर रानी देवयानी के भीतर की आग अब भी जल रही थी। नागौर महल की गलियों में अब वह पहले जैसी रौनक नहीं थी। रानी ने स्वयं अपने महल के कक्ष को छोड़ दिया और उस छोटे मंदिर में रहने लगी जहाँ रणवीर से पहली बार उसकी भेंट हुई थी। उसने आभूषण उतार दिए, रेशमी वस्त्र छोड़ दिए, और साधारण चादर ओढ़ ली।
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| देवयानी |
लोग कहते थे — “रानी अब बोलती नहीं, बस हवा से बातें करती है।” हर शाम वह रेत पर बैठ जाती और पश्चिम की ओर देखती — जहाँ मरवार की सीमाएँ थीं। कभी–कभी वह हवा में हल्के से कहती — “रणवीर, तुम तो वचन निभा गए… अब मेरी बारी है।”
13. मंदिर की प्रतिज्ञा
एक दिन उसने मंदिर के पुजारी से कहा — “मुझे अब कोई उपाधि नहीं चाहिए, बस यही मंदिर मेरा घर होगा।” पुजारी ने पूछा — “महारानी, आपका भविष्य?” वह मुस्कुराई — “जिसका अतीत राख हो गया हो, उसका भविष्य हवा में उड़ जाता है।”
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| महारानी |
देवयानी ने मंदिर के आँगन में एक दीप जलाया और कहा —
“यह दीप तब तक जलेगा जब तक मेरे प्राण हैं। और जब यह बुझ जाए, समझ लेना, मेरी आत्मा रणवीर से जा मिली।”
पुजारी ने आँसू छुपा लिए।
उस दिन से हर रात नागौर में हवा कुछ अलग बहने लगी।
कहते हैं, मंदिर की घंटी बिना किसी के छुए बज उठती थी।
14. बीस बरस बाद
समय बीत गया। बीस वर्ष गुजर गए। मरवार और नागौर दोनों अब शांति के प्रतीक बन गए थे। लोग कहते थे — “रानी देवयानी के त्याग ने दोनों रियासतों को जोड़ दिया।”
पर रानी अब वृद्धा हो चली थी, पर उसकी आँखें अब भी पश्चिम की ओर देखती थीं। एक बार मरवार के नवाब का बेटा, जो अब वहाँ का शासक था, मंदिर आया। उसने देवयानी को प्रणाम किया और कहा — “माँ, मेरे पिता रणवीर पठान थे।
उन्होंने मुझसे कहा था कि जब तक इस रियासत में प्रेम जीवित है, तब तक कोई युद्ध नहीं होगा।” यह सुनकर देवयानी की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने आसमान की ओर देखा और धीरे से कहा — “देखो रणवीर, तुम्हारा वचन अब भी जीवित है…”
15. रेत का अंतिम आलिंगन
उसी रात आंधी चली। मंदिर के दीपक की लौ काँपी। पुजारी ने देखा — रानी मंदिर के सामने ध्यानमग्न बैठी है। सुबह जब सूरज निकला, तो वह वहीं थी — शांत, निश्चल, मुस्कुराती हुई। उसके सामने दीपक बुझ चुका था।
पुजारी ने लोगों को बुलाया। सबने देखा — रानी के होंठों पर मुस्कान थी, जैसे वह किसी को सामने देख रही हो। मंदिर के पीछे की दीवार पर रेत से खुदा था — “रणवीर और देवयानी — दो नाम, एक आत्मा।”
उसी जगह पर आज भी नागौर में एक छोटा सा मंदिर है। लोग कहते हैं, जब हवा चलती है तो घंटी अपने आप बजती है, और कभी–कभी रेत पर दो पदचिह्न उभरते हैं — एक राजपूत की, एक पठान की।
शायद प्रेम मौत से नहीं मरता, वह बस रूप बदल लेता है — कभी रेत की लहरों में, कभी याद की ख़ुशबू में।
16. स्मृति और लोककथा
नागौर के लोग आज भी कहते हैं — “जिस दिन आँधी चले और मंदिर की घंटी बजे, समझ लो रानी देवयानी अपने रणवीर से मिलने आई है।” गाँव की औरतें अपने बच्चों को यह कहानी सुनाती हैं, ताकि वे जानें कि प्रेम सिर्फ़ पाने का नहीं, निभाने का नाम है।
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| रणवीर पठान |
इतिहास के ग्रंथों में यह प्रेमकथा नहीं मिलेगी, क्योंकि इसे इतिहास ने नहीं, रेत और आँसू ने लिखा था। रानी देवयानी और रणवीर पठान — दो धर्म, दो रियासतें, पर एक आत्मा। और राजस्थान की हवाओं में आज भी उनकी ख़ुशबू है।
कहानी समाप्त
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Authour By - Ram AI Craft
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