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अधूरी प्रतिज्ञा – एक रियासत की व्यथा | भाग 2 (अंतिम अध्याय)
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💔 अधूरी प्रतिज्ञा – एक रियासत की व्यथा (Part 2)
वह दीप अब भी जल रहा था... और नवगढ़ की हवाओं में किसी की सिसकी गूंजती थी...
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| रानी चंद्रिका |
📜 सामग्री-सूची (Table of Contents)
- 1. वह दीप जो अमर हो गया
- 2. प्रजा का शोक और रानी की चुप्पी
- 3. राजगुरु का श्राप
- 4. रानी की समाधि
- 5. राज्य का पतन
- 6. अमर प्रेम की गूंज
1. वह दीप जो अमर हो गया
सुबह जब महल के द्वार खुले, तो सब स्तब्ध रह गए। दीप अब भी जल रहा था, जैसे किसी ने रातभर उसकी लौ को संभाले रखा हो। पास ही रानी चंद्रिका शांत बैठी थीं, उनके चेहरे पर एक दिव्य मुस्कान थी। उनके हाथों में वही फूल थे जो उन्होंने अपने विवाह में धारण किए थे।
राजवैद्य ने पास जाकर देखा — उनका शरीर ठंडा पड़ चुका था, पर उनकी आँखों में आँसू नहीं थे। जैसे उन्होंने अपने वचन को पूरी तरह निभा दिया हो। राजमहल के गलियारों में सन्नाटा छा गया। कोई रोया नहीं, क्योंकि सभी जानते थे — यह मृत्यु नहीं, दो आत्माओं का मिलन था।
2. प्रजा का शोक और रानी की चुप्पी
जब यह समाचार राज्यभर में फैला, तो पूरा नवगढ़ रो पड़ा। बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ — सब महल के द्वार पर इकट्ठा हुए। किसी के पास शब्द नहीं थे।
लोग कहते हैं, उस दिन हवा में भी शोक था। पेड़ झुके हुए थे, और पक्षियों ने गाना बंद कर दिया था। राजमहल के बाहर एक गरीब स्त्री ने दीपक जलाया और कहा — “रानी माँ, आपने वचन निभाया। अब हम भी वचन देंगे — आपका दीप कभी न बुझेगा।”
उसी दिन से नवगढ़ में एक प्रथा शुरू हुई — हर पूर्णिमा की रात, हर घर में एक दीप जलाया जाता। लोग कहते — “यह रानी चंद्रिका का दीप है, जो हमें सत्य प्रेम की याद दिलाता है।”
3. राजगुरु का श्राप
जब राजगुरु पंडित सोमदेव को यह सब ज्ञात हुआ, तो वे गहरे ध्यान में चले गए। उन्होंने कहा — “राज्य जिसने अपने सच्चे प्रेमियों को खो दिया, वह अब वैभव नहीं देखेगा।”
उन्होंने राजमहल की चौखट पर खड़े होकर कहा — “जब तक इस भूमि पर सत्य प्रेम का सम्मान नहीं होगा, तब तक यह राज्य अपनी पहचान खो देगा। यह दीप जलता रहेगा, पर इसके साथ यह भूमि भी शोक में रहेगी।”
यह शब्द श्राप जैसे थे — और सचमुच, आने वाले वर्षों में नवगढ़ का वैभव घटता गया। बारिशें कम हुईं, फसलें सूख गईं, और लोग पलायन करने लगे। महल उजड़ने लगा, और उसकी दीवारों पर बेलें उग आईं। पर उस दीप की लौ... आज भी स्थिर थी।
4. रानी की समाधि
राजगुरु के आदेश पर, रानी चंद्रिका के शरीर को उसी दीप के पास समाधि दी गई। पत्थर की वह समाधि आज भी खड़ी है — उस पर लिखा है:
“यहाँ वह रानी विश्राम कर रही हैं, जिसने प्रेम को धर्म बनाया और वचन को जीवन से बड़ा माना।”
समाधि के ऊपर एक पीपल का वृक्ष उग आया। कहते हैं, उस वृक्ष की छाया में बैठने वाला व्यक्ति अपने जीवन का सत्य देख लेता है। कुछ लोगों ने वहाँ रोशनी देखी है, कुछ ने रानी का चेहरा... पर सभी ने एक ही बात महसूस की — “यहाँ प्रेम जीवित है।”
कई राजकुमार उस वृक्ष के नीचे आकर ध्यान करते, पर कोई भी उस आत्मा की गहराई तक नहीं पहुँच सका। क्योंकि वह प्रेम किसी मानवीय सीमा में नहीं बँधा था। वह अनंत था।
5. राज्य का पतन
वर्षों बाद, नवगढ़ के शासक बदलते गए। कोई रानी चंद्रिका जैसा करुणामय न था, न वीरेंद्र सिंह जैसा धर्मनिष्ठ। नए राजाओं ने विलासिता में राज्य की संपत्ति खो दी। मंदिर वीरान हो गए, खेत सूख गए।
कहते हैं, एक राजा ने रानी की समाधि तोड़ने का प्रयास किया ताकि वहाँ महल बनाया जा सके। उसी रात, भूकंप आया — महल गिर गया, और राजा का वंश समाप्त हो गया। तबसे कोई उस समाधि को छूने की हिम्मत नहीं करता।
धीरे-धीरे नवगढ़ इतिहास से मिट गया। केवल खंडहर बचे, और एक दीपक जो आज भी जलता है। यात्रियों ने उसे देखा है — हवा चलती है, पर उसकी लौ नहीं बुझती। लोग कहते हैं, “यह रानी चंद्रिका का प्रण है।”
6. अमर प्रेम की गूंज
सैकड़ों वर्षों बाद, एक इतिहासकार नवगढ़ पहुँचा। उसने समाधि के पास बैठकर लिखा — “मैंने प्रेम की कई कहानियाँ पढ़ीं, पर ऐसा प्रेम कभी देखा नहीं। यह प्रेम मृत्यु से नहीं टूटा, यह मृत्यु से परे जाकर अमर हो गया।”
उसी रात, इतिहासकार ने अपने सपने में रानी चंद्रिका को देखा। उन्होंने मुस्कुराकर कहा — “प्रेम को शब्दों में नहीं, वचनों में जियो। यही मेरी अंतिम प्रतिज्ञा थी — और यही अधूरी रही।”
जब वह सुबह उठा, दीपक अब भी जल रहा था। उसने देखा — रानी की समाधि पर गुलाब का एक फूल रखा था, ताज़ा और सुगंधित। उसने किसी को वहाँ आते नहीं देखा था।
वह वहीं बैठ गया, आँसू उसकी आँखों से बह निकले। और उसने अपने शोधपत्र का नाम रखा — “अधूरी प्रतिज्ञा – वह प्रेम जो मृत्यु के पार गया।”
आज भी जब कोई नवगढ़ की ओर जाता है, तो उस दीप की लौ देखकर कहता है — “यह रानी चंद्रिका का प्रेम है, जो कभी बुझा नहीं।”
🔙 पहला भाग पढ़ें: अधूरी प्रतिज्ञा – Part 1
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