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अधूरी प्रतिज्ञा – एक रियासत की व्यथा | भाग 1
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💔 अधूरी प्रतिज्ञा – एक रियासत की व्यथा (Part 1)
एक प्रेम, एक वचन, और एक अधूरी प्रतिज्ञा जिसने एक राज्य को शोक में डूबो दिया...
📜 सामग्री-सूची (Table of Contents)
- 1. परिचय: वह राज्य जो अब यादों में है
- 2. राजा वीरेंद्र सिंह – एक धर्मपरायण शासक
- 3. रानी चंद्रिका – प्रेम का दूसरा नाम
- 4. उनका मिलन: भाग्य का वरदान
- 5. वह प्रतिज्ञा जिसने सब बदल दिया
- 6. अंत की शुरुआत
1. परिचय: वह राज्य जो अब यादों में है
बहुत वर्षों पहले, हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे से राज्य “नवगढ़” का नाम इतिहास में सोने के अक्षरों में लिखा गया था। यह वह राज्य था जहाँ इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म माना जाता था। वहाँ की हवा में मिठास थी, और लोगों के चेहरों पर सुकून। पर एक दिन, वही धरती रुदन से गूंज उठी — जब उस राज्य की आत्मा टूट गई, उसके राजा और रानी की प्रेम कथा अधूरी रह गई।
यह कोई लोककथा नहीं, बल्कि इतिहास का वह पन्ना है जिसे समय ने मिटा दिया, पर हवा आज भी उसका दर्द गुनगुनाती है।
2. राजा वीरेंद्र सिंह – एक धर्मपरायण शासक
राजा वीरेंद्र सिंह, नवगढ़ के युवा और न्यायप्रिय शासक थे। उनकी आँखों में दृढ़ता और दिल में करुणा थी। वह हर सुबह सूर्योदय से पहले मंदिर में जाकर राज्य के कल्याण की प्रार्थना करते थे। लोग उन्हें “धरती का देव” कहकर पुकारते थे। उन्होंने कभी किसी प्रजा के आँसू को यूँ ही गिरने नहीं दिया।
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| राजा वीरेंद्र सिंह |
पर वीरेंद्र सिंह के भीतर एक खालीपन था — एक अधूरापन जो उनके चेहरे की मुस्कान में छिपा था। उनका विवाह नहीं हुआ था, क्योंकि वे हमेशा कहते थे — “राजा का पहला धर्म राज्य है, प्रेम बाद में।”
3. रानी चंद्रिका – प्रेम का दूसरा नाम
चंद्रिका, पड़ोसी राज्य “सोमनगर” की राजकुमारी थीं — सौंदर्य, शालीनता और बुद्धिमत्ता का प्रतीक। उन्होंने युद्धों में घायल सैनिकों की सेवा की थी, और अक्सर महल की दीवारों के बाहर जाकर गरीबों को भोजन बाँटती थीं।
उनका हृदय कोमल था, पर उनकी आत्मा दृढ़। जब पहली बार वीरेंद्र सिंह ने उन्हें युद्ध के दौरान देखा, वे घायल सैनिकों के बीच बैठी थीं, एक सैनिक का सिर अपनी गोद में रखकर आँसू पोंछ रही थीं। उसी क्षण वीरेंद्र सिंह को लगा — यही वह आत्मा है जिसके लिए उनका जन्म हुआ है।
4. उनका मिलन: भाग्य का वरदान
कुछ महीनों बाद, दोनों राज्यों के बीच शांति संधि हुई। उस दिन महल में दीपक जल उठे, पर असली प्रकाश तो उन दो आँखों में था जो पहली बार एक-दूसरे से बोले बिना सब कह गईं। वीरेंद्र और चंद्रिका का विवाह हुआ — बिना किसी दिखावे के, बिना किसी वैभव के — बस सात वचनों और सच्चे प्रेम के साथ।
राज्य में उत्सव मनाया गया, फूलों की वर्षा हुई। लोग कहते थे, “अब नवगढ़ का भाग्य बदल जाएगा।” सच में, कुछ वर्षों तक नवगढ़ स्वर्ग जैसा हो गया। वीरेंद्र सिंह और चंद्रिका दोनों ने मिलकर राज्य को इतना समृद्ध बना दिया कि कोई भूखा न सोता।
5. वह प्रतिज्ञा जिसने सब बदल दिया
एक रात, राज्य की सीमा पर अचानक शत्रु सेना ने हमला कर दिया। युद्ध की स्थिति बन गई। वीरेंद्र सिंह ने तलवार उठाई, पर जाने से पहले उन्होंने चंद्रिका से वचन लिया — “अगर मैं लौटकर न आऊँ, तो तुम वचन दो कि मेरी याद में जीओगी, मगर अपने आँसू किसी को मत दिखाना।”
रानी ने काँपते होंठों से कहा — “मैं वचन देती हूँ, स्वामी। पर आप लौटेंगे, क्योंकि मेरा विश्वास आप पर है।”
सुबह की पहली किरण के साथ युद्ध आरंभ हुआ। धरती खून से लाल हो उठी, और आसमान पर धुएँ के बादल छा गए। वीरेंद्र सिंह ने सौ से अधिक सैनिकों को बचाया, पर स्वयं बुरी तरह घायल हो गए। उनका शरीर रणभूमि में गिरा, और उनकी आँखें आख़िरी बार महल की दिशा में उठीं।
उस क्षण, दूर महल में चंद्रिका की आरती की लौ अचानक बुझ गई... उन्होंने समझ लिया — उनका प्राणसखा लौटेगा नहीं।
6. अंत की शुरुआत
रानी चंद्रिका ने अपना वचन निभाया। उन्होंने न आँसू बहाए, न किसी से विलाप किया। उन्होंने महल के आँगन में दीप जलाया और कहा — “जब तक यह दीप जलता रहेगा, वीरेंद्र की आत्मा जीवित रहेगी।”
पर वह दीप कभी नहीं बुझा... क्योंकि रानी ने स्वयं को उसी दिन त्याग दिया था। कहा जाता है, रानी ने उसी रात समाधि ले ली — दीप के पास बैठकर, मुस्कुराते हुए। सुबह जब द्वार खुले, तो दीप जल रहा था... और रानी चंद्रिका शांत थीं।
आज भी, नवगढ़ के खंडहरों में वह दीपक हर पूर्णिमा की रात जल उठता है। कोई नहीं जानता कौन जलाता है — पर हवा में अब भी एक आह सी गूँजती है — “वचन अधूरा रहा... प्रेम अमर हो गया।”
👉 अगला भाग पढ़ें: अधूरी प्रतिज्ञा – Part 2
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